जालौन: माइक्रोइरीगेशन गोष्ठी में गूँजा जल संरक्षण का मंत्र, आधुनिक तकनीक से खेती को लाभप्रद बनाने पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD
उरई (जालौन)। कृषि क्षेत्र में बढ़ती लागत और गिरते भू-जल स्तर की चुनौतियों के बीच, जालौन के रूरामल्लू स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र में एक दिवसीय ‘उत्तर प्रदेश माइक्रोइरीगेशन (सूक्ष्म सिंचाई) गोष्ठी’ का सफल आयोजन किया गया। इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से आए लगभग 100 प्रगतिशील किसानों ने प्रतिभाग किया, जिन्हें आधुनिक सिंचाई पद्धतियों और वैज्ञानिक कृषि के गुर सिखाए गए।
संतुलित सिंचाई: पौधों के विकास की कुंजी
गोष्ठी का औपचारिक शुभारंभ मुख्य अतिथि एवं क्षेत्र के प्रतिष्ठित प्रगतिशील कृषक लक्ष्मीनारायण चतुर्वेदी द्वारा किया गया। किसानों को संबोधित करते हुए उन्होंने जल की महत्ता पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “अक्सर हमारी मानसिकता यह होती है कि पानी की उपलब्धता होने पर हम खेतों में अधिकतम सिंचाई कर देते हैं, लेकिन यह धारणा गलत है। अधिक जल भराव और सूखे की स्थिति, दोनों ही पौधों के विकास में बाधक हैं।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि सफल खेती के लिए पानी, उर्वरक और बीज की मात्रा के बीच एक सटीक संतुलन अनिवार्य है। चतुर्वेदी ने किसानों से आह्वान किया कि वे कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केन्द्र और उद्यान विभाग के समन्वय से संचालित योजनाओं का लाभ उठाकर अपनी खेती को लागत-मुक्त और लाभकारी बनाएं।
स्थानीय जलवायु और रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का चयन
कृषि विज्ञान केन्द्र, रूरामल्लू के अध्यक्ष डॉ. मो. मुस्तफा ने तकनीकी सत्र में बोलते हुए ऐसी फसलों और प्रजातियों के चयन पर जोर दिया जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल हों। उन्होंने बताया कि यदि किसान वैज्ञानिक आधार पर रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का चुनाव करते हैं, तो फसलों पर विषैले रसायनों और कीटनाशकों का प्रयोग कम करना पड़ेगा। इससे न केवल खेती की लागत घटेगी, बल्कि आम जनमानस को शुद्ध और उच्च गुणवत्ता वाले कृषि उत्पाद प्राप्त हो सकेंगे।
आधुनिक पद्धतियां: फसल सुरक्षा और लागत में कमी
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मंजुल पाण्डेय ने अपने संबोधन में फसल चक्र परिवर्तन (Crop Rotation) की अनिवार्यता पर बल दिया। उन्होंने किसानों को आधुनिक सुरक्षात्मक तकनीकों जैसे कलर ट्रैप (Color Trap), लाइट ट्रैप और मल्चिंग (Mulching) के प्रयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी। डॉ. पाण्डेय के अनुसार, इन तकनीकों को अपनाने से न केवल कीटों और बीमारियों का प्रकोप कम होता है, बल्कि मिट्टी की नमी भी सुरक्षित रहती है, जो अंततः उत्पादन में वृद्धि करती है।
जैविक खेती और पशुपालन का समन्वय
कृषि वैज्ञानिक श्री मारूफ अहमद ने खेती के साथ-साथ पशुपालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताया। उन्होंने ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा पर चर्चा करते हुए धन जीवामृत, जीवामृत और वर्मी कम्पोस्ट जैसे जैविक उत्पादों के निर्माण और उपयोग की विधि समझाई। उन्होंने कहा कि रासायनिक खादों के विकल्प के रूप में जैविक खाद का प्रयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति को दीर्घकाल तक बनाए रखने में सहायक है।
मोटे अनाज और स्वास्थ्य जागरूकता
कार्यक्रम के दौरान पोषण और स्वास्थ्य पर चर्चा करते हुए कृषि वैज्ञानिक श्रीमती राजकुमारी ने संतुलित आहार के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने वर्तमान समय में मोटे अनाजों (Millets) जैसे ज्वार, बाजरा और कोदो की बढ़ती मांग और इनके औषधीय गुणों के बारे में बताया। उन्होंने किसानों से ‘ग्लूटेन-फ्री’ भोजन के फायदों का प्रचार-प्रसार करने और अपने खेतों में इन्हें स्थान देने का आग्रह किया।
आभार प्रदर्शन:
कार्यक्रम के समापन पर जिला उद्यान अधिकारी परवेज खान ने सभी अतिथि वक्ताओं और प्रशिक्षण में शामिल हुए किसानों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास जताया कि इस गोष्ठी से प्राप्त ज्ञान का उपयोग कर किसान सूक्ष्म सिंचाई के माध्यम से कम पानी में अधिक उत्पादन प्राप्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे।







