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विशेष रिपोर्ट: जालौन में मनरेगा बना ‘लूट की योजना’, अधिकारियों की नाक के नीचे प्रतिदिन लाखों का बंदरबांट

जालौन के नदीगांव ब्लॉक में मनरेगा कार्यस्थल का प्रतीकात्मक चित्र जहाँ खाली जमीन पर फर्जी हाजिरी के जरिए भ्रष्टाचार को दर्शाया गया है

रिपोर्ट : राहुल,जालौन। UP SAMVAD

उरई (जालौन): उत्तर प्रदेश के जालौन जिले से भ्रष्टाचार की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने केंद्र और राज्य सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना ‘मनरेगा’ की शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब मजदूरों को रोजगार की गारंटी देना था, वह अब जालौन के नदीगांव ब्लॉक में भ्रष्ट अधिकारियों और बिचौलियों के लिए अवैध कमाई का ‘सोने का अंडा’ देने वाला जरिया बन चुकी है। जिले में प्रतिदिन लाखों रुपये के सरकारी बजट का बंदरबांट किया जा रहा है, और इस पूरे खेल में पारदर्शिता के लिए बनाए गए डिजिटल सिस्टम को ही ढाल बना लिया गया है।
​डिजिटल तकनीक में सेंध: NMMS ऐप बना भ्रष्टाचार का हथियार
​सरकार ने मनरेगा में धांधली रोकने के लिए NMMS (National Mobile Monitoring System) ऐप अनिवार्य किया था। नियम के मुताबिक, कार्यस्थल से मजदूरों की लाइव फोटो और लोकेशन के साथ हाजिरी अपलोड होनी चाहिए। लेकिन जालौन के ‘सिस्टम’ ने इस तकनीकी सुरक्षा घेरे को भी तोड़ दिया है। सूत्रों के अनुसार, नदीगांव ब्लॉक में एक ही मजदूर की तस्वीर का उपयोग अलग-अलग विकास कार्यों के मस्टररोल में किया जा रहा है। धरातल पर कोई काम नहीं हो रहा, लेकिन डिजिटल रिकॉर्ड में फर्जी हाजिरी और फर्जी मस्टररोल के जरिए सरकारी खजाने से पैसा निकाला जा रहा है।
​इन ग्राम पंचायतों में फैला भ्रष्टाचार का जाल
​भ्रष्टाचार की यह दीमक जिले की कई ग्राम पंचायतों को खोखला कर रही है। जांच की सुई विशेष रूप से डाबर माधौगढ़, पजौनिया, छिरिया खुर्द, डीहा, खैरावर, मौ, पराबर, राजेपुरा, सलैया खुर्द और सींगपुरा जैसी पंचायतों की ओर घूम रही है। इन गांवों में हालत यह है कि बिना एक ईंट हिले या मिट्टी का एक तसला उठाए, कागजों पर लाखों रुपये के भुगतान कर दिए गए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि जॉब कार्ड धारकों को काम की जानकारी तक नहीं होती और उनके नाम पर सिंडिकेट पैसे डकार रहा है।
​जिम्मेदारों की ‘रहस्यमयी’ चुप्पी: डीसी मनरेगा ने फेरा मुंह
​जब इस बड़े घोटाले की परतें उखड़ने लगीं और मीडिया कर्मियों ने तथ्यों के साथ जिम्मेदारों से जवाब मांगा, तो प्रशासन में हड़कंप मच गया। चौंकाने वाली बात यह है कि जिले में मनरेगा के सर्वेसर्वा डीसी मनरेगा रामेंद्र सिंह कुशवाह ने इस मामले पर पूरी तरह चुप्पी साध ली है। मीडिया द्वारा बार-बार फोन किए जाने के बावजूद उन्होंने कॉल रिसीव करना बंद कर दिया है। एक जिम्मेदार अधिकारी का इस तरह सवालों से भागना और मीडिया से दूरी बनाना साफ संकेत देता है कि इस भ्रष्टाचार के सिंडिकेट को ऊपर से संरक्षण प्राप्त है।
​सिंडिकेट का आतंक और प्रशासनिक मिलीभगत
​स्थानीय जानकारों का कहना है कि यह केवल कुछ ग्राम प्रधानों या सचिवों का व्यक्तिगत भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि यह एक सुनियोजित ‘सिंडिकेट’ है। इसमें ब्लॉक स्तर से लेकर जिला स्तर तक के तकनीकी सहायकों और कंप्यूटर ऑपरेटरों की भूमिका भी संदिग्ध है। फर्जी फोटो खींचना, उन्हें अलग-अलग आईडी से अपलोड करना और फिर बिना भौतिक सत्यापन के भुगतान की फाइल पास कर देना—यह बिना उच्चाधिकारियों की मिलीभगत के संभव नहीं है।
​भविष्य के सवाल: क्या होगा एक्शन?
​सवाल यह उठता है कि क्या जालौन के उच्चाधिकारी इस सिंडिकेट को तोड़ने का साहस दिखाएंगे? क्या उन मजदूरों को उनका हक मिलेगा जिनके नाम पर यह करोड़ों की हेराफेरी की जा रही है? वर्तमान में डीसी मनरेगा की चुप्पी और प्रशासन की सुस्ती ने जनता के बीच अविश्वास का माहौल पैदा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि शासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कराता है या फिर यह फाइल भी अन्य घोटालों की तरह ठंडे बस्ते में डाल दी जाएगी।

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