उरई में शिक्षकों का प्रचंड हुंकार: टीईटी की अनिवार्यता के खिलाफ मशाल जुलूस से दहला शहर, हजारों की संख्या में सड़कों पर उतरे गुरुजी

रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD
उरई (जालौन): उत्तर प्रदेश के जालौन जिला मुख्यालय उरई में सोमवार की शाम उस समय ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला, जब जिले भर के हजारों शिक्षकों और कर्मचारियों ने अपनी सेवा सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए मशालें थाम लीं। टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता के विरोध में अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ (AIJTF) के बैनर तले आयोजित इस ‘महा-मशाल जुलूस’ ने सरकार की नीतियों के खिलाफ कड़ा प्रतिरोध दर्ज कराया।
बीएसए कार्यालय से अंबेडकर चौराहे तक गूंजा इंकलाब

आंदोलन की शुरुआत शाम करीब 5:30 बजे जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) कार्यालय से हुई। यहाँ जिले के कोने-कोने से शिक्षक और कर्मचारी एकत्रित हुए। जैसे ही मशालें प्रज्वलित की गईं, पूरा वातावरण “नारेबाजी” और “इंकलाब जिंदाबाद” के नारों से गूंज उठा। शिक्षकों के हाथों में “NO TET BEFORE RTE ACT” लिखी तख्तियां थीं, जो उनके स्पष्ट रुख को बयां कर रही थीं। करीब दो घंटे तक चले इस जुलूस ने शहर के मुख्य मार्गों से गुजरते हुए शाम 7:30 बजे अंबेडकर चौराहे पर पहुंचकर सभा के रूप में तब्दील हो गया।
विभिन्न संगठनों की एकजुटता ने दिखाई ताकत
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता विभिन्न शिक्षक संगठनों का एक मंच पर आना रही। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ, उत्तर प्रदेशीय जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ, अटेवा (पुरानी पेंशन बहाली मंच), एससी/एसटी (बेसिक) टीचर्स वेलफेयर एसोसिएशन, यूनाइटेड टीचर एसोसिएशन (यूटा), विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन और टीएससीटी जैसे प्रभावशाली संगठनों ने इस संघर्ष में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। शिक्षक नेताओं का कहना था कि यह लड़ाई केवल एक परीक्षा की नहीं, बल्कि शिक्षकों के आत्मसम्मान और भविष्य की सुरक्षा की है।
कानूनी और नैतिक तर्क: “नियुक्ति के समय के नियम ही मान्य हों”

प्रदर्शनकारी शिक्षकों ने सरकार के उस निर्णय पर कड़ा प्रहार किया जिसमें सेवा में वर्षों से कार्यरत शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य करने की बात कही गई है। शिक्षकों का तर्क है कि जब उनकी नियुक्तियां हुई थीं, तब टीईटी का कोई अस्तित्व नहीं था और उन्होंने उस समय की सभी अनिवार्य शैक्षिक एवं प्रशिक्षण योग्यताओं (जैसे बीटीसी, बीएड) को पूरा किया था।
शिक्षकों ने स्पष्ट किया कि:
- नियुक्ति के बाद नियमों को पिछली तारीख से लागू करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
- टीईटी की अनिवार्यता से शिक्षकों के प्रमोशन, वेतन वृद्धि और पेंशन जैसे सेवा लाभों पर संकट मंडरा रहा है।
- सर
- कार को चाहिए कि वह सदन में अध्यादेश लाकर इस विसंगति को दूर करे और शिक्षकों को मानसिक उत्पीड़न से बचाए।
प्रशासनिक सतर्कता और जनजीवन पर असर
मशाल जुलूस के कारण उरई के प्रमुख मार्गों पर यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। हजारों की भीड़ और मशालों की कतार को देखते हुए पुलिस प्रशासन को ट्रैफिक डाइवर्ट करना पड़ा। हालांकि, शिक्षकों का अनुशासन बना रहा और आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। भारी पुलिस बल की मौजूदगी में प्रशासन ने स्थिति पर नजर बनाए रखी।
प्रमुख चेहरों की उपस्थिति और भावी रणनीति
इस विशाल मशाल जुलूस का नेतृत्व और संचालन करने वालों में ठाकुरदास यादव, राजेन्द्र राजपूत, सर्वेश शर्मा, सुंदर शास्त्री, राजीव त्रिपाठी, अजय निरंजन, रामप्रकाश गौतम, रामावतार राठौर जैसे कद्दावर नाम शामिल रहे। इनके अलावा निर्पेन्द्र सिंह, उदयकरन राजपूत, धर्मेन्द्र चौहान, आफताब आलम, लोकेश पाल, सुनील निरंजन, भगवती शरण रजक, प्रताप भानु, रामनुग्रह सिंह और आलोक श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में पदाधिकारियों ने हुंकार भरी।
शिक्षक नेताओं ने अंत में चेतावनी दी कि यदि सरकार ने तत्काल प्रभाव से टीईटी अनिवार्यता के आदेश को वापस नहीं लिया, तो यह मशाल जुलूस केवल एक झांकी है; आने वाले समय में जिले से लेकर राजधानी तक जेल भरो आंदोलन और उग्र प्रदर्शन किया जाएगा। शिक्षकों की इस एकजुटता ने फिलहाल प्रशासन और शासन की चिंता बढ़ा दी है।







