प्रकृति की मार: जालौन में ओलावृष्टि से फसलें तबाह, दलित और बटाईदार किसानों के लिए मुआवजे की गूंज

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रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD

उरई (जालौन): बेमौसम बारिश ने छीना किसानों के मुंह का निवाला

​उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में अप्रैल माह के प्रथम सप्ताह में हुई अप्रत्याशित ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश ने अन्नदाता की कमर तोड़ दी है। सोने जैसी चमकती गेहूं, चना, सरसों और मसूर की फसलें, जो कटकर घर आने को तैयार थीं, अब खेतों में बिछ चुकी हैं। इस प्राकृतिक आपदा ने न केवल फसलें बर्बाद की हैं, बल्कि जिले के सैकड़ों परिवारों के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। इसी संकट को लेकर मंगलवार को बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच (BDAM) ने जिलाधिकारी जालौन, राजेश कुमार पांडेय से मुलाकात कर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा और तत्काल राहत की मांग की।

सर्वेक्षण से छूटने का डर: दलित और बटाईदार किसानों की बढ़ी चिंता

​ज्ञापन सौंपते समय मंच के प्रतिनिधियों ने प्रशासन का ध्यान एक बेहद संवेदनशील मुद्दे की ओर खींचा। संगठन का तर्क है कि सरकारी स्तर पर होने वाले प्राथमिक सर्वेक्षणों में अक्सर दलित बस्तियों और बटाईदार (सीमान्त) किसानों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। चूंकि बटाईदार किसानों के पास जमीन का मालिकाना हक कागजों पर नहीं होता, इसलिए आपदा राहत राशि के वितरण में वे तकनीकी रूप से पिछड़ जाते हैं, जबकि असल में खेती की लागत और पसीना उन्हीं का लगा होता है।

​मंच के प्रतिनिधियों ने कठोंद, माधौगढ़, रामपुरा, कोंच, नदीगांव, सिरसा कलार और कालपी जैसे सुदूर क्षेत्रों का जमीनी दौरा किया है। उन्होंने बताया कि इन क्षेत्रों में तबाही का मंजर भयावह है और सबसे अधिक मार गरीब और भूमिहीन किसानों पर पड़ी है।

आजीविका और शिक्षा पर संकट: पलायन की आशंका

​फसल की बर्बादी केवल आर्थिक हानि नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक संकट को भी जन्म दे रही है। कई किसानों ने खेती के लिए साहूकारों और बैंकों से कर्ज लिया था। फसल नष्ट होने के बाद अब उनके सामने कर्ज चुकाने, बच्चों के स्कूलों की फीस भरने और साल भर के राशन का संकट खड़ा हो गया है। बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो प्रभावित परिवारों को आजीविका की तलाश में महानगरों की ओर पलायन करने पर मजबूर होना पड़ेगा।

प्रशासन के समक्ष प्रमुख मांगें और केस स्टडी

​संगठन ने जिलाधिकारी को 8 विस्तृत केस स्टडी भी सौंपी हैं, जो प्रभावित परिवारों की वास्तविक स्थिति को दर्शाती हैं। ज्ञापन के माध्यम से प्रशासन से निम्नलिखित मुख्य मांगें की गई हैं:

  1. निष्पक्ष और पारदर्शी सर्वे: जिले के सभी प्रभावित गांवों में बिना किसी भेदभाव के राजस्व टीम द्वारा सर्वेक्षण कराया जाए।
  2. बटाईदारों का विशेष आकलन: जो किसान दूसरों की जमीन पर खेती कर रहे हैं, उनका अलग से डेटा तैयार कर उन्हें सीधे राहत राशि दी जाए।
  3. मनरेगा के तहत रोजगार: प्रभावित क्षेत्रों में मनरेगा के कार्यों को तत्काल गति दी जाए ताकि किसानों को नकद आय प्राप्त हो सके।
  4. ऋण माफी और सहायता: आपदा प्रभावित किसानों के कृषि ऋणों की वसूली स्थगित की जाए और उन्हें अगली फसल के लिए बीज व खाद उपलब्ध कराई जाए।

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