मथुरा प्रसाद महाविद्यालय में रोवर रेंजरों ने सीखे जीवन रक्षक गुर: विषम परिस्थितियों में आत्मनिर्भरता का मिला मंत्र

रिपोर्ट : राहुल,जालौन। UP SAMVAD
कोंच (जालौन): शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को जीवन की कठिन से कठिन चुनौतियों से लड़ने के लिए तैयार करने का माध्यम है। इसी उद्देश्य को सार्थक करते हुए स्थानीय मथुरा प्रसाद महाविद्यालय में आयोजित पांच दिवसीय ‘रोवर रेंजर प्रशिक्षण शिविर 2026’ के तीसरे दिन सोमवार को प्रतिभागियों को सर्वाइवल स्किल्स और आपदा प्रबंधन की बारीकियों से अवगत कराया गया। टीम लोटस के नेतृत्व में आयोजित इस सत्र ने छात्रों में अनुशासन और आत्मनिर्भरता का नया संचार किया।
ध्वजारोहण और बीपी सिक्स के सम्मान से हुई शुरुआत
शिविर के तृतीय दिवस का शुभारंभ गरिमामय वातावरण में ध्वजारोहण के साथ हुआ। यह कार्यक्रम रोवर रेंजर आंदोलन के जनक लॉर्ड बैडेन पॉवेल (बीपी सिक्स) के सम्मान में समर्पित रहा, जो सेवा और समर्पण की भावना को जीवंत करता है। ध्वजारोहण के पश्चात महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. विजय विक्रम सिंह एवं एनसीसी प्लाटून के लेफ्टिनेंट डॉ. हरीशचंद्र तिवारी ने संयुक्त रूप से शिविर में भाग ले रही विभिन्न टीमों और क्रू का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने टीमों के अनुशासन, उनकी तैयारी और शिविर की सुव्यवस्थित व्यवस्थाओं की मुक्त कंठ से सराहना की।
गांठों की कला और आपदा प्रबंधन का व्यावहारिक ज्ञान
द्वितीय सत्र में रेंजर प्रभारी डॉ. मधुरलता द्विवेदी ने प्रशिक्षण की कमान संभाली। उन्होंने रोवर-रेंजर सदस्यों को विभिन्न प्रकार की गांठें (Knots) लगाने का गहन प्रशिक्षण दिया। उन्होंने ‘क्लोव हिच’, ‘बोलाइन’, ‘शीट बेंड’ और ‘फिगर ऑफ ऐंठ’ जैसी महत्वपूर्ण गांठों का न केवल व्यवहारिक प्रदर्शन किया, बल्कि उनकी महत्ता पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।
डॉ. द्विवेदी ने बताया कि ये गांठें केवल रस्सी बांधने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि आपदा प्रबंधन, शिविर स्थापना, प्राथमिक चिकित्सा और जल-उद्धार जैसे आपातकालीन कार्यों में जीवन रक्षक सिद्ध होती हैं। प्रतिभागियों ने इन तकनीकों का उत्साहपूर्वक अभ्यास किया, जो उनके सर्वाइवल स्किल्स को मजबूती प्रदान करने वाला रहा।
तंबू स्थापना और बिना बर्तनों के भोजन: ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’
सत्र के अंतिम और सबसे रोचक चरण में रोवर प्रभारी डॉ. भूपेंद्र कुमार त्रिपाठी ने समस्त रोवर-रेंजरों को तंबू लगाने की कला सिखाई। उन्होंने तंबू स्थापना में प्रयुक्त होने वाली विशेष गांठों जैसे ‘टेंशनर नॉट्स’ एवं ‘गाइलाइन हिच’ का विस्तृत प्रदर्शन किया।
प्रशिक्षण का मुख्य आकर्षण संसाधनों के अभाव में जीवन जीने की कला रही। डॉ. त्रिपाठी ने छात्रों को बिना बर्तनों के भोजन बनाने की प्राचीन और प्रभावी तकनीकें जैसे ‘स्टोन बॉइलिंग’ (पत्थरों के माध्यम से उबालना) एवं ‘लीफ कुकिंग’ (पत्तों में भोजन पकाना) सिखाई। इसके अलावा जंगल में आग जलाना, जल संग्रहण के तरीके, प्राथमिक उपचार और मानसिक मजबूती जैसे पहलुओं पर जानकारी दी गई। डॉ. त्रिपाठी ने जोर देते हुए कहा कि ये कौशल न केवल शिविर जीवन में उपयोगी हैं, बल्कि वास्तविक जीवन की अनपेक्षित चुनौतियों में युवाओं को आत्मनिर्भर और साहसी बनाते हैं।
नेतृत्व और कौशल विकास पर जोर
प्राचार्य डॉ. विजय विक्रम सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि इस प्रकार के शिविरों का मुख्य उद्देश्य युवाओं में नेतृत्व क्षमता विकसित करना और उन्हें समाज सेवा के लिए तैयार करना है। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय प्रशासन निरंतर प्रयासरत है कि छात्रों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ ऐसे व्यावहारिक अनुभव प्रदान किए जाएं जो उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनाने में सहायक हों। इस दौरान महाविद्यालय का अन्य शैक्षणिक स्टाफ और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे

Rahul (रिपोर्टर,जालौन) जालौन जनपद में स्थानीय समाचारों की ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हैं। प्रशासन, सामाजिक मुद्दों और जनहित से जुड़ी खबरों को तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत करते हैं।






