जालौन: सरकारी दावों की खुली पोल, नसबंदी के 8 माह बाद महिला ने दिया बच्चे को जन्म; स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर उठे सवाल

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जालौन के सरकारी अस्पताल के बाहर खड़ा पीड़ित परिवार, नसबंदी फेल होने के बाद नवजात शिशु के साथ न्याय की गुहार लगाते माता-पिता

रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD

उरई (जालौन): जनपद के डाकोर क्षेत्र से स्वास्थ्य विभाग की एक ऐसी लापरवाही सामने आई है, जिसने सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रमों की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार जहाँ एक ओर जनसंख्या नियंत्रण के लिए करोड़ों रुपये विज्ञापनों और नसबंदी अभियानों पर खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर विभाग के जिम्मेदारों की कथित अनदेखी के कारण ‘नसबंदी फेल’ होने के मामले सामने आ रहे हैं। ताज़ा मामला एक गरीब दंपत्ति से जुड़ा है, जहाँ नसबंदी प्रक्रिया के महज आठ महीने बाद महिला ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया है।

क्या है पूरा मामला?

​मिली जानकारी के अनुसार, जालौन के डाकोर क्षेत्र के निवासी भानुप्रताप ने अपने परिवार को सीमित रखने और बेहतर भविष्य की योजना के तहत वर्ष 2023 में अपनी पत्नी भूरी की नसबंदी कराई थी। यह प्रक्रिया स्थानीय सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञों की देखरेख में संपन्न हुई थी। परिजनों का आरोप है कि उस वक्त डॉक्टरों ने नसबंदी को पूरी तरह सफल बताया था और उचित परामर्श के बाद महिला को घर भेज दिया गया था। दंपत्ति को भरोसा था कि अब वे अपने सीमित संसाधनों में अपने परिवार का पालन-पोषण ठीक से कर सकेंगे।

आठ माह बाद ‘नया मेहमान’, परिवार में हैरानी और चिंता

​नसबंदी के कुछ समय बाद जब महिला के स्वास्थ्य में बदलाव महसूस हुआ, तो जांच कराने पर गर्भधारण की पुष्टि हुई। अंततः आठ माह बाद भूरी ने एक पुत्र को जन्म दिया। इस खबर ने न केवल परिवार बल्कि पूरे ग्रामीण अंचल में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। भानुप्रताप का कहना है कि उन्होंने विभाग पर भरोसा किया था, लेकिन यह बच्चा उनकी किसी योजना का हिस्सा नहीं बल्कि स्वास्थ्य विभाग की अक्षमता का परिणाम है।

पीड़ित परिवार ने उठाई मुआवजे की मांग

​पीड़ित भानुप्रताप ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में एक अतिरिक्त बच्चे का पालन-पोषण करना उनके लिए बड़ी चुनौती है। उन्होंने प्रशासन से सीधा सवाल किया है कि जब उन्होंने सरकारी प्रक्रिया का पालन किया, तो फिर यह विफलता क्यों हुई? पीड़ित दंपत्ति ने अब प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से मुआवजे की मांग की है। उनकी मांग है कि बच्चे के भविष्य, उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी समस्त खर्चों का वहन सरकार करे, क्योंकि यह “मेडिकल नेग्लिजेंस” (चिकित्सा लापरवाही) का स्पष्ट मामला है।

सरकारी अभियानों की साख पर खतरा

​ग्रामीणों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग केवल कागजों पर लक्ष्य पूरे करने में जुटा रहता है। यदि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की जाए, तो विभाग के भीतर व्याप्त ऐसी कई और खामियां उजागर हो सकती हैं। स्थानीय लोगों ने सीएमओ (CMO) जालौन से मांग की है कि संबंधित डॉक्टरों और कर्मचारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी मानसिक और आर्थिक स्थिति से न गुजरना पड़े।

​फिलहाल, यह मामला सोशल मीडिया और स्थानीय गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि विभाग अपनी गलती स्वीकार कर इस गरीब परिवार को राहत देता है या फिर हमेशा की तरह तकनीकी दलीलों के पीछे अपनी नाकामी छुपाता है।

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