सिस्टम की बेरहमी: जालौन जिला अस्पताल में इलाज के अभाव में फूट-फूट कर रोए बेबस पिता और बेटी; डॉक्टर ने कहा- ‘खून नहीं है, कहीं और जाओ’

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जालौन जिला अस्पताल के परिसर में जमीन पर बैठकर रोते हुए एक बेबस पिता और उनकी 17 वर्षीय बीमार बेटी, जिनके चेहरे पर लाचारी और सिस्टम के प्रति मायूसी साफ दिखाई दे रही है।

रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD

उरई (जालौन) : उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त और आम जनता के लिए सुलभ बनाने के दावों के बीच बुंदेलखंड के जालौन जिले से एक ऐसी हृदयविदारक तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी दावों की पोल खोल कर रख दी है। जिला अस्पताल में इलाज की उम्मीद लेकर आए एक अत्यंत गरीब और मजबूर पिता को जब डॉक्टरों ने कथित तौर पर दुत्कार कर भगा दिया, तो व्यवस्था से हारा वह पिता अपनी 17 वर्षीय बीमार बेटी को गले लगाकर अस्पताल परिसर में ही फूट-फूट कर रोने लगा। इस मार्मिक दृश्य को देखकर वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं और अस्पताल प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

खून की कमी देख डॉक्टर ने खड़े किए हाथ

​प्राप्त जानकारी के अनुसार, जालौन के एक सुदूर ग्रामीण इलाके का रहने वाला एक अत्यंत निर्धन पिता अपनी 17 वर्षीय बेटी की बिगड़ती तबीयत को सुधारने की आस में उसे जिला अस्पताल लेकर पहुँचा था। इमरजेंसी वार्ड में तैनात डॉक्टर ने जब युवती की प्राथमिक जाँच की, तो पाया कि उसके शरीर में खून की अत्यधिक कमी है।

​चिकित्सक ने पिता को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि “शरीर में खून न हो तो जान भी जा सकती है, इसलिए इसे तुरंत खून चढ़ाने की आवश्यकता है।” जान बचाने वाले डॉक्टर के मुँह से यह बात सुनकर पिता सहम गया।

“पैसे नहीं हैं साहब, आप ही इंतजाम कर दो…”

​डॉक्टर द्वारा खून चढ़वाने की बात कहे जाने पर लाचार पिता ने अपनी अत्यधिक कंगाली और मजबूरी का वास्ता दिया। उसने डॉक्टर के सामने हाथ जोड़कर कहा कि वह एक अत्यंत गरीब मजदूर है और उसके पास बाहर से खून खरीदने या निजी तौर पर व्यवस्था करने के लिए पैसे नहीं हैं। उसने डॉक्टरों से मिन्नतें कीं कि सरकारी अस्पताल के स्तर पर ही उसकी बेटी के लिए खून का प्रबंध कर दिया जाए।

पिता की इस गुहार पर अस्पताल का रवैया बेहद क्रूर रहा। पीड़ित के अनुसार, डॉक्टर ने सीधे तौर पर मदद करने से इनकार करते हुए कहा— “यहाँ खून नहीं है, हमारे पास कोई इंतजाम नहीं है। इसे यहाँ से ले जाओ और कहीं और जाकर दिखाओ।”

अस्पताल परिसर बना आंसुओं का गवाह

​बिना किसी इलाज या प्राथमिक उपचार के अस्पताल से बाहर धकेल दिए जाने के बाद, उस मजबूर पिता और उसकी कमजोरी से ढाल होती बेटी का हौसला पूरी तरह टूट गया। जिला अस्पताल के परिसर में ही दोनों जमीन पर बैठ गए और एक-दूसरे को पकड़कर जोर-जोर से रोने लगे। एक लाचार पिता अपनी आँखों के सामने अपनी मासूम बेटी को जिंदगी और मौत के बीच जूझते हुए देख रहा था, लेकिन सिस्टम की बेरुखी के आगे वह पूरी तरह असहाय था।

​वहाँ से गुजरने वाले मरीजों और तीमारदारों ने जब इस दर्दनाक दृश्य को देखा, तो हर कोई ठहर गया। लोगों ने अस्पताल प्रशासन के इस अमानवीय रवैये के प्रति भारी आक्रोश व्यक्त किया।

मीडिया के सामने छलका दर्द: व्यवस्था से तीखे सवाल

​जब इस घटना की सूचना स्थानीय मीडिया कर्मियों को मिली, तो उन्होंने मौके पर पहुँच कर पीड़ित परिवार से बात की। कैमरे के सामने रोते हुए पीड़ित पिता ने अपनी बाइट में कहा:

“हम बहुत दूर गांव से अपनी बेटी के इलाज की आस में यहाँ (जिला अस्पताल) आए थे। इमरजेंसी में डॉक्टर साहब ने कहा कि इसके शरीर में खून बहुत कम है, तुरंत खून चढ़ेगा। जब मैंने कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं और आप ही कोई रास्ता निकालिए, तो उन्होंने कहा कि यहाँ खून नहीं है और हमें बाहर जाने को कह दिया। अब हम गरीब लोग कहाँ जाएं? क्या पैसे न होने पर हमारी बेटी को मरने के लिए छोड़ दें?”

कागजी दावों और जमीनी हकीकत का फासला

​यह पूरी घटना उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में गरीबों को मिलने वाले मुफ्त इलाज और जीवन रक्षक दवाओं/रक्त की उपलब्धता के दावों पर एक करारा तमाचा है। शासन द्वारा हर जिले में ब्लड बैंक और मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं के लिए करोड़ों का बजट आवंटित किया जाता है, लेकिन जालौन की यह घटना साबित करती है कि जमीनी स्तर पर स्थितियाँ आज भी जस की तस हैं।

​अस्पताल परिसर में आंसू बहाती उस 17 वर्षीय युवती और उसके बेबस पिता की यह तस्वीर अब सूबे के स्वास्थ्य महकमे और स्थानीय प्रशासन से जवाब मांग रही है कि— क्या वास्तव में गरीबों के लिए सरकारी अस्पतालों के दरवाजे बंद हो चुके हैं, और क्या बिना पैसे के किसी गरीब को गरिमापूर्ण इलाज पाने का कोई हक नहीं है? इस मामले में अब देखना यह होगा कि उच्चाधिकारी दोषी डॉक्टरों पर क्या कार्रवाई करते हैं।

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