ऐतिहासिक नगरी कालपी की पहचान पर संकट: अस्तित्व खो चुका ‘उरई दरवाजा’ अब बना व्यावसायिक परिसर, नगरवासियों में भारी आक्रोश

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जालौन के कालपी में ऐतिहासिक उरई दरवाजे के स्थान पर बनी व्यावसायिक दुकानें और आक्रोशित स्थानीय नागरिक

रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD

कालपी (जालौन): उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में स्थित बुंदेलखंड की ऐतिहासिक नगरी कालपी अपनी प्राचीन वास्तुकला और गौरवशाली इतिहास के लिए जानी जाती है। लेकिन हाल के वर्षों में प्रशासन की कथित अनदेखी और भू-माफियाओं के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण यहाँ की धरोहरें एक-एक कर दम तोड़ रही हैं। ताज़ा मामला नगर के प्रसिद्ध और ऐतिहासिक ‘उरई दरवाजे’ का है, जो अब इतिहास के पन्नों से मिटकर पूरी तरह व्यावसायिक दुकानों में तब्दील हो चुका है। इस घटना ने न केवल कालपी के सांस्कृतिक स्वरूप को चोट पहुँचाई है, बल्कि स्थानीय जनता के विश्वास को भी गहरा धक्का लगा है।

शानदार अतीत का प्रतीक था ‘उरई दरवाजा’

​उरई दरवाजा केवल ईंट-पत्थरों का एक ढांचा नहीं था, बल्कि यह कालपी के गौरवशाली अतीत का एक सजीव गवाह था। दो मंजिला यह विशाल दरवाजा अपनी अनोखी नक्काशी, बेजोड़ स्थापत्य कला और सामरिक महत्व के लिए प्रसिद्ध था। इतिहासकारों के अनुसार, कालपीधाम की सुरक्षा और पहचान के लिए चार प्रमुख प्रवेश द्वार बनाए गए थे, जिनमें से उरई दरवाजा अंतिम शेष द्वार था। बाकी तीन दरवाजे पहले ही समय की मार और उपेक्षा का शिकार होकर नष्ट हो चुके थे।

पुनर्निर्माण का वादा निकला खोखला

​स्थानीय निवासियों का कहना है कि कुछ समय पूर्व तत्कालीन प्रशासन ने इस दरवाजे को ‘जर्जर’ और ‘खतरनाक’ घोषित करते हुए गिरा दिया था। उस समय विरोध कर रहे नगरवासियों को यह लिखित या मौखिक आश्वासन दिया गया था कि सुरक्षा कारणों से इसे गिराया जा रहा है, लेकिन जल्द ही इसका पुनर्निर्माण उसी पुरानी स्थापत्य शैली और नक्काशी के साथ कराया जाएगा। विडंबना यह है कि पुनर्निर्माण की फाइलें तो सरकारी दफ्तरों में धूल फांकती रहीं, लेकिन उस जमीन पर रातों-रात व्यावसायिक दुकानें खड़ी हो गईं।

नगरपालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप

​नीलाभ शुक्ला, कन्हैया गुप्ता, राजू पाठक, पवन, दीपक, शिवम, अवधेश और बबलू सहित दर्जनों नगरवासियों ने इस मामले में सीधे तौर पर नगरपालिका और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत का आरोप लगाया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि:

​”प्रशासन की ढिलाई और नगर पालिका के कुछ अधिकारियों के संरक्षण में प्रभावशाली लोगों ने इस ऐतिहासिक भूमि पर अवैध कब्जा कर लिया है। जहाँ कभी नगर की विरासत खड़ी थी, वहाँ अब निजी स्वार्थ के लिए शटर गिराए जा रहे हैं।”

​नगरवासियों ने सवाल उठाया है कि जब प्रदेश सरकार सार्वजनिक संपत्तियों और ऐतिहासिक स्थलों से अतिक्रमण हटाने के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपना रही है, तो कालपी में इतनी बड़ी धरोहर को खुर्द-बुर्द करने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

सांस्कृतिक विरासत का अपूरणीय नुकसान

​बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों का मानना है कि उरई दरवाजे का अंत कालपी की सांस्कृतिक पहचान के लिए एक अपूरणीय क्षति है। कालपी, जो महर्षि वेदव्यास की जन्मस्थली और रानी लक्ष्मीबाई की रणभूमि रही है, वहाँ धरोहरों का इस तरह नष्ट होना पर्यटन की संभावनाओं को भी खत्म कर रहा है। सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच नहीं हुई और बची हुई अन्य धरोहरों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में ही कालपी का इतिहास पढ़ पाएंगी।

​फिलहाल, उरई दरवाजे के स्थान पर खड़ी दुकानें प्रशासन की विफलता और रसूखदारों के बढ़ते प्रभाव की कहानी बयां कर रही हैं। नगरवासियों ने जिलाधिकारी से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

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