जालौन: रासलीला जीव का शिव से मिलन, काम पर विजय का प्रतीक है— कथा व्यास बजरंगी महाराज

रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD
जालौन: जनपद के ऐतिहासिक सरस्वती मंदिर परिसर में आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के छठे दिन भक्ति की अविरल धारा बही। कथा के छठे सोपान पर श्रोताओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा, जहाँ नैमिषारण्य से पधारे सुप्रसिद्ध कथा व्यास पंडित बजरंगी महाराज ने भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं और उनके आध्यात्मिक स्वरूप का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया।
ईश्वरीय बाल लीलाओं में छिपा है परमानंद
कथा व्यास ने भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का प्रसंग छेड़ते हुए कहा कि जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों की छोटी-छोटी चेष्टाओं को देखकर प्रफुल्लित होते हैं, उसी प्रकार भक्त भगवान की बाल लीलाओं का श्रवण कर भावविभोर और बेसुध हो जाते हैं। महाराज श्री ने स्पष्ट किया कि यह आनंद सांसारिक सुखों से परे है, जो मनुष्य के अंतर्मन को शांति और सकारात्मकता प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि कृष्ण की हर लीला में लोक कल्याण और अधर्म के नाश का संदेश छिपा है।
रासलीला: कामदेव पर भगवान की विजय का शंखनाद
छठे दिन की कथा का मुख्य आकर्षण ‘महारास’ का प्रसंग रहा। पंडित बजरंगी महाराज ने रासलीला की गलत व्याख्या करने वालों को सचेत करते हुए कहा, “रासलीला कोई कामुक क्रीड़ा नहीं, बल्कि जीव का शिव से मिलन की पराकाष्ठा है। यह काम को बढ़ाने की नहीं, बल्कि काम (वासना) पर विजय प्राप्त करने की गाथा है।”
उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार कामदेव ने अपनी पूरी शक्ति के साथ खुले मैदान में भगवान पर आक्रमण किया था, लेकिन वह श्रीकृष्ण को विचलित करने में विफल रहा और अंततः उसे स्वयं परास्त होना पड़ा। उन्होंने जोर देकर कहा कि रासलीला में शंका करना या उसे सांसारिक दृष्टि से देखना ही सबसे बड़ा पाप है।
अभिमान का त्याग और विरह की शक्ति
गोपी गीत की व्याख्या करते हुए कथा व्यास ने एक गहरा जीवन दर्शन साझा किया। उन्होंने कहा कि जब-जब जीव के भीतर ‘अभिमान’ जागृत होता है, भगवान उससे दूरी बना लेते हैं। लेकिन जब वही जीव अहंकार त्याग कर विरह की अग्नि में तपता है और अनन्य भाव से प्रभु को पुकारता है, तो श्रीकृष्ण स्वयं प्रकट होकर उसे दर्शन देते हैं। भगवान सदैव भाव के भूखे हैं, वैभव के नहीं।
रुक्मणी विवाह प्रसंग: धन और लक्ष्मी का सदुपयोग
कथा के उत्तरार्ध में भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मणी के विवाह का भव्य प्रसंग सुनाया गया। महाराज ने बताया कि विदर्भ राज की पुत्री रुक्मणी साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप हैं और लक्ष्मी कभी नारायण से दूर नहीं रह सकतीं। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने सामाजिक संदेश देते हुए कहा कि यदि मनुष्य अपनी लक्ष्मी (धन) को परमार्थ और भगवत सेवा में नहीं लगाता, तो वह धन चोरी, बीमारी या अन्य अनचाहे मार्गों से नष्ट हो जाता है। धन की सार्थकता केवल परोपकार में है।
श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति
इस भक्तिमय आयोजन के अवसर पर मंदिर के मुख्य पुजारी हृदयनारायण दीक्षित, परीक्षित नरेश चंद्र शिवहरे, पुष्पा देवी, शैलेंद्र, उत्तम, राजकिशोर, राजकुमार, दामोदर दास, बृजेश, राकेश, राघवेंद्र समेत भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा के अंत में भव्य आरती का आयोजन हुआ और प्रसाद वितरण के साथ छठे दिन की कथा को विश्राम दिया गया।







