तमाशबीन भीड़ और फेल सिस्टम के बीच फरिश्ता बने पत्रकार: मौत के मुंह से खींच लाए तीन जिंदगियां

0
जालौन के आटा टोल प्लाजा के पास सड़क हादसे के घायल पिता और बच्चों को अस्पताल ले जाते पत्रकार और मौके पर खराब खड़ी सरकारी एंबुलेंस।

रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD

जालौन। आधुनिक समाज में जहाँ तकनीक ने हमें एक-दूसरे से जोड़ा है, वहीं मानवीय संवेदनाएं कहीं पीछे छूटती नजर आ रही हैं। जनपद जालौन के आटा टोल प्लाजा के पास सोमवार को घटी एक हृदयविदारक घटना ने जहाँ समाज की संवेदनहीनता और सरकारी सिस्टम की जर्जरता को उजागर किया, वहीं पत्रकारिता के उस स्वरूप को भी पेश किया जो कलम चलाने के साथ-साथ जान बचाना भी जानता है।

भीषण भिड़ंत और तमाशबीन बनी भीड़

​घटना सोमवार की है, जब ग्राम चाकी निवासी अजय (35 वर्ष) अपने दो मासूम बेटों, देवराज (10 वर्ष) और सागर (12 वर्ष) के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर जा रहे थे। आटा टोल प्लाजा के समीप उनकी बाइक अनियंत्रित होकर आगे चल रही ट्रैक्टर-ट्रॉली से जा टकराई। टक्कर इतनी भीषण थी कि अजय लहूलुहान होकर सड़क पर गिर पड़े, वहीं उनके दोनों बच्चे छिटककर दूर जा गिरे। एक मासूम दर्द से तड़प रहा था, जबकि दूसरा अचेत अवस्था में पड़ा था।

​हैरत की बात यह रही कि मौके पर दर्जनों लोगों की भीड़ जमा हो गई। मदद के लिए हाथ बढ़ने के बजाय, दर्जनों मोबाइल फोन कैमरे ऑन हो गए। लोग उस दर्दनाक मंजर का वीडियो बनाने में व्यस्त थे, लेकिन किसी ने भी उन तड़पते बच्चों को अस्पताल पहुँचाने की जहमत नहीं उठाई।

जब ‘खबर’ से बड़ी ‘जिंदगी’ हो गई

​उसी दौरान कवरेज के लिए निकले ‘एआरके सुपरफास्ट न्यूज’ के पत्रकार रविकांत कुशवाहा और ‘भारत परिवर्तन’ के ब्यूरो चीफ विकाश सिंह वहां से गुजर रहे थे। घटनास्थल का दृश्य देखकर इन पत्रकारों ने एक पल की भी देरी नहीं की। उन्होंने अपने कैमरे और माइक को एक तरफ रखा और ‘खबर’ बनाने से पहले ‘इंसानियत’ को चुनना बेहतर समझा।

​पत्रकारों ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए आटा टोल प्लाजा से एक निजी वाहन की व्यवस्था कराई। उन्होंने अपनी शर्ट और हाथों के खून की परवाह किए बिना तीनों घायलों को खुद गोद में उठाकर गाड़ी तक पहुँचाया और उन्हें तत्काल जिला मेडिकल कॉलेज रेफर कराया।

अस्पताल में भी निभाया अभिभावक का फर्ज

​इन पत्रकारों का उत्तरदायित्व केवल अस्पताल पहुँचाने तक सीमित नहीं रहा। मेडिकल कॉलेज पहुँचते ही उन्होंने डॉक्टरों से संपर्क कर घायलों का तत्काल उपचार शुरू करवाया। घायल पिता और बच्चों के परिजनों को सूचित करने के साथ-साथ, उन्होंने अपनी जेब से आर्थिक सहायता भी प्रदान की ताकि दवाइयों और शुरुआती इलाज में कोई बाधा न आए। उनकी इस त्वरित सूझबूझ और संवेदनशीलता के कारण आज तीनों घायलों की स्थिति खतरे से बाहर बताई जा रही है।

सिस्टम की पोल: ‘धक्का मार’ एंबुलेंस और कागजी फिटनेस

​इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग के दावों की भी धज्जियां उड़ा दीं। हादसे के बाद मौके पर सरकारी एंबुलेंस पहुँची तो जरूर, लेकिन वह मौके पर ही जवाब दे गई। ड्राइवर ने काफी प्रयास किया, लेकिन एंबुलेंस स्टार्ट ही नहीं हुई। जिस एंबुलेंस को ‘जीवनदायिनी’ कहा जाता है, वह सिस्टम की लापरवाही के कारण खुद ‘वेंटिलेटर’ पर नजर आई। अगर उस वक्त पत्रकार देवदूत बनकर नहीं पहुँचते, तो शायद तीन जिंदगियां सिस्टम की इस बदहाली की भेंट चढ़ जातीं।

समाज और प्रशासन के लिए कड़े सवाल

​यह घटना हमारे समाज के लिए एक गंभीर आईना है। क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि किसी की जान से ज्यादा हमारे लिए सोशल मीडिया का वीडियो महत्वपूर्ण है? साथ ही, प्रशासन के लिए भी यह बड़ी चेतावनी है। जर्जर एंबुलेंसों की फिटनेस जाँच केवल कागजों पर क्यों हो रही है?

o

Leave a Reply

You may have missed