कोंच: आवास की बकाया राशि के लिए दर-दर भटक रही दिव्यांग महिला, ब्लॉक कर्मचारियों पर लगाया मानसिक शोषण का आरोप

रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD
कोंच, जालौन (UP Samvad): उत्तर प्रदेश सरकार जहाँ एक ओर अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर धरातल पर ब्लॉक स्तर के कर्मचारियों की कार्यप्रणाली इन दावों पर सवालिया निशान लगा रही है। ताज़ा मामला जनपद जालौन की कोंच तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम देवगांव से सामने आया है, जहाँ एक दिव्यांग महिला अपनी आवास योजना की अंतिम किस्त के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।
किस्तों का गणित और अधूरी आस
ग्राम देवगांव की निवासिनी मंजू पुत्री सुक्के, जो शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं, ने मंगलवार को तहसील मुख्यालय पहुँचकर उपजिलाधिकारी (SDM) ज्योति सिंह को अपनी पीड़ा सुनाई। मंजू ने बताया कि उन्हें दिव्यांग योजना के अंतर्गत आवास आवंटित किया गया था। नियमानुसार उन्हें अब तक दो किस्तें प्राप्त हो चुकी हैं, जिसमें पहली किस्त के रूप में 70,000 रुपये और दूसरी किस्त के रूप में 40,000 रुपये उनके खाते में आए। आवास निर्माण को पूर्ण करने के लिए अब केवल 10,000 रुपये की अंतिम किस्त शेष है, जिसके लिए वह महीनों से ब्लॉक कार्यालय और बैंक के बीच फुटबॉल बनी हुई हैं।
ब्लॉक कर्मचारियों पर गंभीर आरोप: ‘झूठ बोलकर कर रहे शोषण’
पीड़िता मंजू ने एसडीएम को सौंपे गए शिकायती पत्र में ब्लॉक नदीगांव के कर्मचारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मंजू का कहना है कि जब उन्होंने अपनी बकाया राशि के संबंध में मुख्य विकास अधिकारी (CDO) उरई और ब्लॉक कार्यालय नदीगांव में प्रार्थना पत्र दिया, तो उन्हें न्याय मिलने के बजाय गुमराह किया गया। पीड़िता के अनुसार, ब्लॉक कर्मचारी लगातार झूठ बोल रहे हैं और कह रहे हैं कि उनके 10,000 रुपये ‘कैलिया बैंक’ स्थित उनके खाते में भेज दिए गए हैं।
दिव्यांग महिला का आरोप है कि जब वह बैंक जाकर जांच कराती हैं, तो पता चलता है कि खाते में कोई पैसा नहीं आया है। बार-बार दफ्तर बुलाकर और झूठा आश्वासन देकर कर्मचारी उनका मानसिक व आर्थिक शोषण कर रहे हैं, जिससे उनकी स्थिति और भी दयनीय हो गई है।
प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग
मंजू ने उपजिलाधिकारी ज्योति सिंह से गुहार लगाई है कि वह इस मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप करें। उन्होंने मांग की है कि ब्लॉक नदीगांव के संबंधित पटल के कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए और उनके आवास की रुकी हुई किस्त जल्द से जल्द उनके वास्तविक खाते में हस्तांतरित करवाई जाए, ताकि वह अपने सिर की छत का निर्माण कार्य पूरा कर सकें।
सिस्टम की संवेदनहीनता पर सवाल
एक दिव्यांग महिला का अपनी हक की राशि के लिए जिला मुख्यालय से लेकर तहसील तक भटकना, प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि सरकारी दस्तावेजों में पैसा भेज दिया गया है और लाभार्थी के खाते में नहीं पहुँचा, तो यह तकनीकी खामी है या भ्रष्टाचार का कोई नया तरीका? ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे कई मामले सामने आते हैं जहाँ अशिक्षित या दिव्यांग लाभार्थियों को कागजी उलझनों में फँसाकर परेशान किया जाता है।
उपजिलाधिकारी ज्योति सिंह ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित विभाग से रिपोर्ट तलब करने और जल्द निस्तारण का आश्वासन दिया है। अब देखना यह होगा कि मंजू को उनके हक की राशि कब तक मिल पाती है।







