प्रशासनिक दक्षता और सुशासन के लिए तकनीक अनिवार्य: जालौन में रिमोट सेंसिंग और जीआईएस पर एक दिवसीय कार्यशाला संपन्न

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जालौन के विकास भवन स्थित रानी लक्ष्मीबाई सभागार में जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय की अध्यक्षता में आयोजित रिमोट सेंसिंग और जीआईएस कार्यशाला में उपस्थित वैज्ञानिक और जिला स्तरीय अधिकारी।

रिपोर्ट : राहुल, जालौन।UP SAMVAD

जालौन : प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता लाने, विकास योजनाओं को अधिक परिणाममुखी बनाने और सरकारी संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करने की दिशा में जालौन जिला प्रशासन ने एक बड़ी पहल की है। बुधवार को विकास भवन स्थित रानी लक्ष्मीबाई सभागार में एक दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन्स सेंटर (उत्तर प्रदेश, लखनऊ) द्वारा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से आयोजित की गई थी। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला कलेक्टर (जिलाधिकारी) राजेश कुमार पाण्डेय ने की। इस उच्च स्तरीय कार्यशाला में जिले के तमाम आला अधिकारियों को आधुनिक भू-स्थानिक तकनीकों (Geospatial Technologies) के व्यावहारिक अनुप्रयोगों का प्रशिक्षण दिया गया।

आधुनिक तकनीकों से बदलेगी प्रशासनिक व्यवस्था की सूरत

​कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य सरकारी अधिकारियों को रिमोट सेंसिंग (सुदूर संवेदन), जीआईएस (जियोग्राफिकल इंफॉर्मेशन सिस्टम) और जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) जैसी अत्याधुनिक तकनीकों से रूबरू कराना था। वैज्ञानिकों ने विस्तार से बताया कि कैसे इन तकनीकों के माध्यम से जमीनी स्तर पर चल रही विकास योजनाओं की सटीक मॉनिटरिंग की जा सकती है।

​कार्यशाला के दौरान रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन्स सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पी.पी.एस. यादव, डॉ. अर्जुन सिंह, परियोजना वैज्ञानिक डॉ. जय कुमार मिश्रा और अवनीश कुमार ने विभिन्न महत्वपूर्ण सरकारी परियोजनाओं में इन तकनीकों के उपयोग से तैयार किए गए जनपदवार ‘डिजिटल डाटाबेस’ का सजीव प्रस्तुतीकरण (Presentation) किया। इस डाटाबेस की मदद से अधिकारी अब एक क्लिक पर जिले की भौगोलिक और ढांचागत स्थिति का सटीक आकलन कर सकेंगे।

इन क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव लाएंगे जीआईएस और रिमोट सेंसिंग

​मंच से बोलते हुए तकनीकी विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने रेखांकित किया कि रिमोट सेंसिंग और जीआईएस तकनीक केवल मानचित्र बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह जनहितकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का आधार बन चुकी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे:

  • कृषि एवं भू-राजस्व: फसलों के रकबे का अनुमान, फसल स्वास्थ्य की निगरानी और भूमि अभिलेखों का सटीक डिजिटलाइजेशन।
  • जल संरक्षण एवं सिंचाई: जल निकायों की स्थिति, जलभराव वाले क्षेत्रों की पहचान और नहरों व लघु सिंचाई परियोजनाओं का वैज्ञानिक नियोजन।
  • ग्राम्य विकास एवं पंचायती राज: ग्रामीण संपत्तियों की जियो-टैगिंग और मनरेगा के तहत होने वाले विकास कार्यों का सत्यापन।
  • वन एवं आपदा प्रबंधन: वन क्षेत्र की निगरानी, अवैध कटान पर रोक और बाढ़ या सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय त्वरित राहत व बचाव कार्य।

​वैज्ञानिकों ने जोर देकर कहा कि इन तकनीकों के प्रयोग से सबसे बड़ा लाभ ‘रियल टाइम मॉनिटरिंग’ के रूप में मिलेगा। इससे न केवल विकास कार्यों में अभूतपूर्व तेजी आएगी, बल्कि सरकारी धन और संसाधनों का दुरुपयोग भी पूरी तरह से रुकेगा।

भुवन, गतिशक्ति पोर्टल और लिडार तकनीक पर विशेष सत्र

​कार्यशाला के तकनीकी सत्र में वैज्ञानिकों ने केंद्र व राज्य सरकार के महत्वपूर्ण डिजिटल पोर्टलों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। अधिकारियों को ‘भुवन पोर्टल’ और ‘प्रधानमंत्री गतिशक्ति पोर्टल’ के संचालन और लाभों के बारे में विस्तार से प्रशिक्षित किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि इन पोर्टलों के माध्यम से विभिन्न सरकारी विभागों के अलग-अलग डाटाबेस को एक ही प्लेटफॉर्म पर एकीकृत (Integrate) किया जा सकता है, जिससे अंतर-विभागीय समन्वय बेहतर होगा और किसी भी परियोजना की प्लानिंग में समय की बचत होगी।

​इसके साथ ही, कार्यशाला में ‘लिडार’ (LiDAR – Light Detection and Ranging) तकनीक की उपयोगिता पर भी विशेष चर्चा हुई। वैज्ञानिकों ने बताया कि लिडार तकनीक के जरिए हवाई या जमीनी स्तर से लेजर किरणों की मदद से किसी भी क्षेत्र की भू-आकृति और वहां मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का अत्यंत सटीक और त्रिविमीय (3D) आकलन किया जा सकता है, जो बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा।

तकनीक आधारित व्यवस्था ही सुशासन की पहली शर्त: जिलाधिकारी

​अपने अध्यक्षीय संबोधन में जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय ने कार्यशाला के आयोजन को समय की मांग बताया। उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि वर्तमान समय में तकनीक आधारित प्रशासनिक व्यवस्था सुशासन (Good Governance) की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। अब पारंपरिक तरीकों को छोड़कर अधिकारियों को अपडेट होना होगा।

​”शासन की प्राथमिकता वाली सभी विकास और कल्याणकारी योजनाओं में आधुनिक तकनीकों का अधिकतम और अनिवार्य उपयोग सुनिश्चित किया जाए। जब हम जीआईएस और जीपीएस जैसी तकनीकों का उपयोग करेंगे, तो कार्यों में पारदर्शिता स्वतः बढ़ जाएगी। हमारा अंतिम लक्ष्य यह होना चाहिए कि आमजन को बिना किसी देरी और बाधा के योजनाओं का त्वरित व न्यायसंगत लाभ मिल सके।”

राजेश कुमार पाण्डेय, जिलाधिकारी, जालौन

कार्यशाला में जिले के शीर्ष अधिकारियों की रही गरिमामयी उपस्थिति

​इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय पर आयोजित कार्यशाला में जिले के प्रशासनिक अमले ने पूरी गंभीरता से प्रतिभाग किया। कार्यक्रम में अपर जिलाधिकारी (ADM), समस्त उप जिलाधिकारी (SDM), जिला विकास अधिकारी (DDO), जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी, उप निदेशक कृषि, जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO), उपायुक्त मनरेगा सहित जल निगम, लघु सिंचाई विभाग और लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता उपस्थित रहे। इसके अलावा, ग्रामीण विकास की धुरी माने जाने वाले जिले के सभी खंड विकास अधिकारियों (BDO) ने भी इस तकनीकी प्रशिक्षण सत्र में भाग लिया और अपने-अपने विकास खंडों में इसके क्रियान्वयन का संकल्प लिया।

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